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शहरों को रेगिस्तान बनाने की साजिश !

In Uncategorized on मई 17, 2011 by vichaarmanch

आधुनिकता की अंधी दौड़  में अनेक भारतीय शहरों में सड़कों के चौड़ीकरण और सौन्दर्यीकरण के नाम पर हरे-भरे वृक्षों की कटाई मनमाने तरीके से चल रही है. सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष तेजी से कम होते जा रहे हैं . पच्चीसों साल पुराने पेड़ों को मिनटों में काट कर जाने कहाँ गायब कर दिया जाता है !बचे -खुचे पेड़ सड़क-डामरीकरण की चपेट में आकर बेमौत मरने लगे हैं .उनकी जड़ों तक डामर बिछाई जा रही है .ऐसे में जड़ों तक पानी पहुंचेगा भी कैसे ? ऐसा लगता है कि देश के शहरों को रेगिस्तान में तब्दील करने की कोई साजिश चल रही है . बड़े -बड़े निर्णायक पदों पर विराजमान लोग इन शहरों में  निवास करते हैं, जिनके हाथों शासन की कमान भी है. लेकिन उन्हें अपने शहर की घटती हरियाली की  कोई फ़िक्र नहीं है. वे अपने विशाल बंगलों में हरी घास की लॉन बिछवाकर और कुछ छोटे-छोटे फूलों के पौधे लगवाकर उसी में मगन हैं ,जबकि लाखों शहरवासी सड़कों पर अंजुरी भर छाया के लिए मोहताज . हर साल पांच जून को पर्यावरण दिवस में वृक्षारोपण का नाटक जमकर खेला जाता है. नेता,मंत्री , कथित समाजसेवी ,सब जगह-जगह पौधे लगाते हैं और अखबारों में अपनी फोटो देख कर और छपी हुई खबरनुमा विज्ञप्ति को पढकर मन ही मन खुश होते रहते हैं. इसके बाद उन्हें यह फ़िक्र नहीं रहती कि उनके लगाए पौधों का क्या हाल है ? जानवर उन्हें चर जाते हैं , वृक्षारोपण के लिए लगवाई गयी फेंसिंग के लोहे के तार चोरों और कबाड़ियों की भेंट चढ जाते है.पर्यावरण दिवस से शुरू हो कर मानसून के पूरे  चार महीने तक जगह-जगह ये नाटक चलता रहता है. दरअसल इस नाटक के जारी रहने में बहुत से लोगों को फायदा ही फायदा है .वन विभाग के अफसरों को ये लाभ है कि वे लगाए गए पौधों के फर्जी आंकड़े दर्शा कर ,पौधों की मनमानी कीमत बताकर , गड्ढे तैयार करने और फेंसिंग का झूठा खर्च बता कर सरकारी खजाने से करोड़ों रूपए हजम कर सकते हैं . यह काम मिल बाँट कर होता है. वन विभाग के बारे में जनता में यह धारणा है कि इस विभाग में जहां पेड़ लगाने पर रूपए कमाए जा सकते हैं , वहीं पेड़ काटने पर भी धन की बरसात होती है . कौन देखने जाता है कि पौधे एक लाख लगे कि एक करोड ? इन्हें लगाने के लिए गड्ढे कितने खोदे गए और वास्तव में कितनी मजदूरी का भुगतान हुआ ? जनता को अपनी रोजी-रोटी की फिकर छोड़ कर इतनी फुर्सत है भी कहाँ ? तभी तो फारेस्ट  वालों की मौज ही मौज है . और शहर रेगिस्तान बन रहे हैं ! आगे क्या लिखूं ? आप खुद समझदार हैं !

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One Response to “शहरों को रेगिस्तान बनाने की साजिश !”

  1. शहर के लोग हरियाली के दुश्मन बन कर आत्महत्या की राह पर हैं, तो क्या किया जा सकता है ?चिपको आंदोलन वाले सुन्दरलाल बहुगुणा की ज़रूरत अब शहरों में भी महसूस के जा रही है. बहरहाल ज्वलंत विषय पर आलेख के लिए बधाई.

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